आपके अधिकार
वोल्टेज के झटके से उपकरण जल गया? डिस्कॉम पर आपका क्या बकाया है, और दावा कैसे करें
डिस्कॉम की तरफ़ की ख़राबी से जले फ़्रिज या टीवी का ख़र्च वसूलने का रास्ता क़ानून देता है। पर वह पैसा मिलेगा या नहीं, यह क़ानून से कम और इस बात से ज़्यादा तय होता है कि पहले दो दिनों में आपने क्या-क्या लिखकर रखा।
Power Watch · 9 अक्टूबर 2026 · 12 मिनट
अक्सर कहानी ऐसे चलती है। लाइन पर काम के लिए बिजली जाती है, या आँधी में कोई कनेक्शन टूट जाता है। लौटती है तो बत्तियाँ ज़रूरत से ज़्यादा चमकती हैं, स्विचबोर्ड पर कुछ चटकता है, और जले प्लास्टिक की गंध आती है। सुबह तक टीवी बंद पड़ा है, इन्वर्टर एरर दिखा रहा है, फ़्रिज चुप है — और आधी गली व्हाट्सऐप पर अपना-अपना नुक़सान गिना रही है।
यह गाइड बताती है कि तारों पर असल में क्या बिगड़ा, भारतीय क़ानून आपसे क्या वादा करता है और क्या नहीं, उपभोक्ता आयोगों ने ऐसे मामले कैसे तय किए, और वे कौन-से सबूत थे जिन्होंने पैसा पाने वाले घरों को ख़ाली हाथ लौटे घरों से अलग किया। यह लंबी कटौती के तय मुआवज़े के बारे में नहीं है — उसका अपना पन्ना है — और यह क़ानूनी सलाह भी नहीं है।
तारों पर असल में क्या होता है
शहरों की ज़्यादातर गलियों को ट्रांसफ़ॉर्मर से तीन फ़ेज़ और एक साझा न्यूट्रल के ज़रिए बिजली मिलती है: किसी भी फ़ेज़ और न्यूट्रल के बीच करीब 230 वोल्ट, दो फ़ेज़ों के बीच करीब 400। लोड बराबर रखने के लिए घर तीनों फ़ेज़ों पर बाँटे जाते हैं, और सबकी धारा उसी एक न्यूट्रल से लौटती है।
अब मान लीजिए वह न्यूट्रल टूट गया — खंभे पर ज़ंग खाया जोड़, गर्मी में जलकर खुला कनेक्टर, आँधी में टूटा तार। तब अलग-अलग फ़ेज़ों वाले घर असल में दो फ़ेज़ों के बीच के 400 वोल्ट पर एक-दूसरे के साथ सीरीज़ में जुड़ जाते हैं, और यह वोल्टेज उनके लोड के हिसाब से बँटता है। जो घर सबसे कम धारा खींच रहा है, उसके हिस्से ज़्यादा वोल्टेज आता है। जिस घर में सिर्फ़ टीवी और राउटर चल रहे हों, वहाँ 300 वोल्ट से काफ़ी ऊपर पहुँच सकता है, जबकि अगले फ़ेज़ पर मोटर चला रहे घर का वोल्टेज बैठ जाता है। इसीलिए एक परिवार का टीवी जल जाता है और पड़ोसियों को बस बत्ती मद्धम लगी थी।
दूसरा तरीक़ा कम होता है पर ज़्यादा भयानक है: एचटी का तार नीचे की एलटी लाइन से छू जाना। उत्तराखंड के एक मामले में आँधी से 11 केवी का जम्पर एलटी लाइन पर आ गिरा और एक ही गाँव के करीब पंद्रह घरों के उपकरण जल गए। एचटी का वोल्टेज घर की वायरिंग तक पहुँचे, तो या तो सुरक्षा उपकरण पलक झपकते लाइन काट देता है, या चीज़ें जलती हैं।
तीसरा है बिजली लौटने का पल। लाइन पर काम के दौरान हिला न्यूट्रल अगर ठीक से न कसा जाए, तो बिजली के साथ टूटे न्यूट्रल वाली समस्या भी सीधे लौट आती है — और उसी पल ट्रांसफ़ॉर्मर से जुड़ा हर फ़्रिज, पंप और एसी एक साथ चालू होता है। जिस कंप्रेसर की बिजली एक मिनट पहले गई थी, उसमें गैस का दबाव अब भी ऊँचा है; उसके ख़िलाफ़ दोबारा चालू होने पर वह अटक जाता है और चलने वाली धारा से कई गुना ज़्यादा खींचता है। 2009 में तय हुए दिल्ली के एक मामले में शिकायत ठीक यही थी: सुबह के शटडाउन के बाद बिजली लौटी तो कुछ मिनट बहुत ऊँचा वोल्टेज आया, और टीवी में आग लग गई।
| क्या ख़राब हुआ | आपको क्या दिखता है | आम तौर पर ज़िम्मेदारी किसकी |
|---|---|---|
| खंभे पर या सर्विस केबल में न्यूट्रल टूटा | एक ही समय पर कुछ घरों में तेज़ चौंधियाती रोशनी और जलते इलेक्ट्रॉनिक्स, कुछ में मद्धम | डिस्कॉम का नेटवर्क |
| एचटी तार एलटी लाइन से छू गया | चमक या धमाका, फिर कई घरों में एक साथ उपकरण बंद, अक्सर आँधी में | डिस्कॉम का नेटवर्क |
| बिजली लौटाते समय ग़लत जोड़ | शटडाउन या फ़ॉल्ट के बाद बिजली लौटने के पहले कुछ मिनटों में नुक़सान | डिस्कॉम का नेटवर्क, अगर उसके कर्मचारियों के काम से हुआ |
| आपकी अपनी वायरिंग में ढीला न्यूट्रल या जोड़ | सिर्फ़ आपका घर प्रभावित; अपनी भारी मशीन चालू करते ही बत्तियाँ टिमटिमाती हैं | आपकी। शिकायत से पहले वायरमैन बुलाइए। |
क़ानून असल में क्या वादा करता है
इस विषय पर ऑनलाइन लिखी ज़्यादातर बातें बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 43 का हवाला देती हैं। धारा 43 कनेक्शन मिलने के बारे में है: आवेदन मिलने के एक महीने के भीतर डिस्कॉम को बिजली देनी होगी। इसमें सप्लाई की गुणवत्ता या जले उपकरणों पर एक शब्द नहीं है, और नुक़सान के दावे में इसे लिखना पढ़ने वाले को बता देता है कि चिट्ठी लिखने वाले ने इसे पढ़ा ही नहीं।
जो धारा सच में लागू होती है, वह 57 है। इसके तहत आपके राज्य का विद्युत नियामक आयोग “स्टैंडर्ड्स ऑफ़ परफ़ॉर्मेंस” तय करता है, और उन पर खरी न उतरने वाली डिस्कॉम प्रभावित व्यक्ति को उतना मुआवज़ा देने की ज़िम्मेदार है जितना आयोग तय करे। बिजली (उपभोक्ता अधिकार) नियम, 2020 वोल्टेज से जुड़ी शिकायतें निपटाने के समय को उन मानकों में गिनते हैं जिन पर मुआवज़ा बनता है। ध्यान से पढ़ें तो यह वोल्टेज ठीक करने में देरी का मुआवज़ा है — आपके राज्य की अनुसूची में तय एक रक़म। अधिनियम या 2020 के नियमों में कहीं आपके टीवी की क़ीमत नहीं लिखी।
जिन राज्यों की अनुसूची हम पढ़ पाए हैं, उनकी रक़में एक पन्ने पर हैं: बिजली कटौती का मुआवज़ा। अगर आपका राज्य अनसुलझी वोल्टेज शिकायत के लिए भुगतान करता है, तो वह भी माँगिए। रक़म छोटी है, और जले सामान की क़ीमत से अलग चीज़ है।
उपकरण की क़ीमत नुक़सान का दावा है, और उसकी सामान्य जगह उपभोक्ता आयोग है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 “बिजली या अन्य ऊर्जा की आपूर्ति” को नाम लेकर सेवा मानता है, और लापरवाही या चूक के ऐसे हर काम को “कमी” (deficiency) में गिनता है जिससे उपभोक्ता को नुक़सान हो। बिजली अधिनियम की धारा 42(8) अपने शिकायत मंचों के साथ-साथ उपभोक्ता के बाक़ी अधिकार भी बचाए रखती है। और 2013 में यू.पी. पावर कॉरपोरेशन बनाम अनीस अहमद में सुप्रीम कोर्ट ने सीमा खींची: धारा 126 और 135 से 140 के तहत चोरी या अनधिकृत उपयोग के आकलन को उपभोक्ता आयोग में चुनौती नहीं दी जा सकती, पर सेवा में कमी की शिकायत उसके दायरे में है।
पेच “लापरवाही” शब्द में है। आयोग सिर्फ़ इसलिए डिस्कॉम से पैसा नहीं दिलाएगा कि आपका उपकरण ख़राब हो गया। आपको दिखाना होगा कि सप्लाई असामान्य थी, कि गड़बड़ी मीटर के डिस्कॉम वाले हिस्से से आई, और कि उसी से नुक़सान हुआ। नीचे के मामले ठीक इसी पर जीते और हारे गए।
ऐसे मामले असल में कैसे तय हुए हैं
चार आदेश, सब सार्वजनिक, सब इस गाइड के लिए पूरे पढ़े गए। दो उपभोक्ता के पक्ष में गए, दो नहीं।
उत्तराखंड, 2008। जिस आँधी में 11 केवी का जम्पर एलटी लाइन पर गिरा था, उसके बाद गाँव के एक परिवार ने जले उपकरणों का दावा किया। बिजली कंपनी ने आँधी को दैवी आपदा बताया और अपने सप्लाई विनियमों की उस धारा का सहारा लिया जो उसकी ज़िम्मेदारी सीमित करती थी। राज्य आयोग ने दोनों दलीलें ठुकरा दीं: वह धारा सप्लाई रुकने पर लागू होती है, लापरवाही पर नहीं, और एलटी लाइन का ट्रिप होने की जगह चालू रहना दिखाता है कि उसका ठीक से रख-रखाव नहीं हुआ था। ज़िला फ़ोरम का ₹25,000 और 9% ब्याज का आदेश बरक़रार रहा। मामला कंपनी के अपने विद्युत निरीक्षक की रिपोर्ट और करीब पंद्रह घरों के एक साथ प्रभावित होने से जीता गया। फिर भी रक़म दावे से कम मिली, क्योंकि परिवार गिनाई गई हर चीज़ के पुराने बिल या कैश मेमो नहीं दिखा पाया।
दिल्ली, 2009। शिकायत यह थी कि सुबह की मरम्मत के बाद बिजली लौटी तो कुछ मिनट बहुत ऊँचा वोल्टेज आया, टीवी में आग लगी और कमरा जल उठा। डिस्कॉम ने ऊँचे वोल्टेज से इनकार किया और घर के अंदर के शॉर्ट सर्किट की बात कही। दिल्ली राज्य आयोग ने उसे सेवा में कमी का ज़िम्मेदार ठहराया — इस तर्क पर कि सप्लाई करने वाले को अपने उपकरणों की जाँच करते रहना होता है — और नुक़सान के ₹1,00,000 और परेशानी व ख़र्च के ₹25,000 दिलाए। यह ज़िला फ़ोरम की रक़म का लगभग आधा था, क्योंकि नुक़सान का ठीक से आकलन नहीं हुआ था। एफ़आईआर और फ़ायर ब्रिगेड का आना रिकॉर्ड पर था।
हिमाचल प्रदेश, जनवरी 2026। सोलन के एक घरेलू उपभोक्ता ने कहा कि झटके से ₹31,295 के उपकरण ख़राब हुए, और उसके वोल्टमीटर ने 400 वोल्ट दिखाए थे। ज़िला आयोग ने उसे ₹50,000 दिलाए; राज्य आयोग ने वह आदेश रद्द कर दिया। उसके पास सिर्फ़ अपना हलफ़नामा था: न पड़ोसियों के हलफ़नामे, न कुछ और। बोर्ड के लाइनमैन ने हलफ़नामे पर कहा कि मीटर ठीक चल रहा था और दोष घर की वायरिंग का था, और बोर्ड ने बताया कि मोहल्ले से किसी और ने शिकायत नहीं की। आयोग ने लिखा कि साबित करने का भार शिकायतकर्ता पर है — और वह उसे पूरा नहीं कर पाया।
राष्ट्रीय आयोग, 2015। गुजरात की एक प्लास्टिक फ़ैक्ट्री ने 1998 की आग का दोष वोल्टेज के झटके पर डाला और करीब ₹3.9 करोड़ माँगे जो बीमे से नहीं मिले थे। राष्ट्रीय आयोग ने मामला दो आधारों पर ख़ारिज किया। आईआईटी दिल्ली के विशेषज्ञ पैनल को झटका आने का कोई पक्का सबूत नहीं मिला, और शिकायत समय-सीमा के बाहर थी, क्योंकि वाद-कारण घटना की तारीख़ से ही बन गया था।
चारों को साथ रखिए तो तस्वीर साफ़ है। जो घर जीते, वे दिखा पाए कि घटना उनकी अपनी वायरिंग से आगे की थी: निरीक्षक की रिपोर्ट, एक साथ कई घरों का नुक़सान, रिकॉर्ड पर आग। जो हारा, उसके पास एक पाठ्यांक था और उसके साथ कुछ नहीं। चारों सबूत पर तय हुए, क़ानून की किसी बारीकी पर नहीं।
वे सबूत जो फ़ैसला करते हैं
कुछ भी ठीक कराने या फेंकने से पहले यह सब जुटाइए। ज़्यादातर मुफ़्त है, और ज़्यादातर एक महीने बाद मिलना नामुमकिन है।
- शिकायत नंबर। जिस वक़्त हो रहा हो, डिस्कॉम को फ़ोन कीजिए और नंबर व समय लिख लीजिए। यही वह अकेला रिकॉर्ड है जो डिस्कॉम ख़ुद रखती है कि आपके पते पर कुछ हुआ था।
- समय के साथ वोल्टेज का पाठ्यांक। स्टेबलाइज़र, इन्वर्टर या प्लग-इन वोल्टमीटर के डिस्प्ले की फ़ोन से खींची फ़ोटो, टाइमस्टैम्प के साथ, बाद की किसी भी याद से बेहतर है। हिमाचल का मामला अकेले पाठ्यांक से नहीं जीता गया, पर जिस मामले में साथ में कुछ और हो, उसे यह मज़बूत करता है।
- नुक़सान की फ़ोटो, फिर मैकेनिक की लिखित जाँच। सर्विस इंजीनियर से कहिए कि ख़राबी की वजह जॉब शीट पर लिखकर दस्तख़त करे; कंपनी की रिपोर्ट, जिसमें लिखा हो कि उपकरण ओवर-वोल्टेज से ख़राब हुआ, आपके अपने बयान से कहीं बेहतर सबूत है। बदले गए पुर्ज़े सँभालकर रखिए।
- ख़रीद के बिल और मरम्मत की रसीदें। उत्तराखंड वाला परिवार जीता, पर बिल न होने से दावे से कम पाया। बिल खो गया हो तो वारंटी कार्ड, बैंक या कार्ड स्टेटमेंट, या दुकान से डुप्लिकेट इनवॉइस — कुछ न होने से बेहतर है।
- पड़ोसी, लिखित में। यही कड़ी सबसे ज़्यादा छूटती है और सबसे ज़्यादा मायने रखती है। हर प्रभावित घर से एक छोटा, दस्तख़त किया बयान — नाम, पता, क्या ख़राब हुआ और कब — डिस्कॉम की उस रटी-रटाई दलील का जवाब है कि ख़राबी आपकी अपनी वायरिंग में थी। कई प्रभावित परिवार साथ मिलकर शिकायत भी कर सकते हैं: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम एक जैसे हित वाले एक या ज़्यादा उपभोक्ताओं को, आयोग की अनुमति से, सबकी ओर से शिकायत करने देता है।
- कोई भी सरकारी काग़ज़। आग लगी हो तो एफ़आईआर या फ़ायर ब्रिगेड की रिपोर्ट। डिस्कॉम का कोई भी लिखित जवाब, निरीक्षण नोट या फ़ॉल्ट रिपोर्ट। उस दिन आपके इलाक़े के शटडाउन की कोई सूचना।
Power Watch की रिपोर्टें इनके साथ काम आती हैं, इनकी जगह नहीं। एक ही गली से एक ही घंटे में आई वोल्टेज उतार-चढ़ाव की कई रिपोर्टें इस बात की अच्छी पुष्टि हैं कि समस्या पूरे इलाक़े की थी, किसी एक घर की नहीं। ये शपथ पर दिया गया सबूत नहीं हैं, और आयोग इन्हें आपके काग़ज़ों की पृष्ठभूमि की तरह पढ़ेगा, सबूत की तरह नहीं। जिस वक़्त हो रहा हो, Power Watch पर दर्ज कीजिए, और अपनी फ़ाइल के लिए नक़्शे का स्क्रीनशॉट ले लीजिए।
दावा, क़दम-दर-क़दम
डिस्कॉम के मना करने के बाद दो रास्ते हैं: शिकायत निवारण मंच, जिसे चलाना उसकी क़ानूनी ज़िम्मेदारी है, और उपभोक्ता आयोग। दोनों की शुरुआत एक जैसी है।
- उसी दिन शिकायत दर्ज कराइए। शिकायत नंबर लेकर ही मानिए, और लिखिए कि कब फ़ोन किया और क्या जवाब मिला।
- पहले फ़ोटो, फिर जाँच। कोई भी मरम्मत होने से पहले: फ़ोटो, पाठ्यांक, और मैकेनिक की लिखी हुई ख़राबी की वजह।
- अपने सब-डिवीज़न दफ़्तर को लिखिए। चिट्ठी अपने सब-डिवीज़न के सहायक अभियंता (AEN) के नाम लिखिए: उपभोक्ता संख्या, शिकायत नंबर, तारीख़ और समय, क्या हुआ, क्या ख़राब हुआ और मरम्मत या बदलने का ख़र्च, साथ में सबूतों की प्रतियाँ। मुआवज़ा और लिखित जवाब माँगिए। मुहर लगी पावती लीजिए, या ईमेल या रजिस्टर्ड डाक से भेजिए ताकि तारीख़ रिकॉर्ड पर रहे।
- एक बार, लिखकर याद दिलाइए। करीब एक महीने में जवाब न आए, तो पहली चिट्ठी का हवाला देकर एक रिमाइंडर भेजिए। लिखित इनकार भी काम का है: उससे पता चलता है कि डिस्कॉम अपने बचाव में क्या कहेगी।
- मंच चुनिए। स्टैंडर्ड्स ऑफ़ परफ़ॉर्मेंस की तय रक़म के लिए, और बार-बार की ख़राबी ठीक कराने के लिए, CGRF और फिर बिजली लोकपाल के पास जाइए। उपकरण की क़ीमत के लिए आम तौर पर ज़िला उपभोक्ता आयोग ही व्यावहारिक जगह है। एक ही शिकायत के लिए एक ही रास्ता चुनिए।
- दो साल की घड़ी याद रखिए। उपभोक्ता शिकायत घटना के दो साल के भीतर दायर करनी होती है। पर्याप्त कारण हो तो आयोग देरी माफ़ कर सकता है, पर इसके भरोसे मत बैठिए।
CGRF मुफ़्त है, और 2020 के नियमों के तहत उसे आम तौर पर 30 दिन में और किसी भी हाल में 45 दिन के भीतर फ़ैसला करना होता है; उसके ऊपर राज्य आयोग का नियुक्त बिजली लोकपाल है। सीमा इस बात की है कि वह दिला क्या सकता है। मिसाल के लिए, केरल के 2023 के मंच विनियम फ़ोरम के मुआवज़े को स्टैंडर्ड्स ऑफ़ परफ़ॉर्मेंस विनियमों में तय रक़मों से बाँधते हैं, और अप्रत्यक्ष, परिणामी, आनुषंगिक, दंडात्मक या उदाहरणात्मक हर्जाने को साफ़ बाहर रखते हैं। हर राज्य के नियम अलग हैं, इसलिए अपने राज्य के पढ़िए, पर CGRF से जले फ़्रिज की क़ीमत की उम्मीद मत रखिए। केरल का लोकपाल वह शिकायत भी लौटा देता है जो पहले से किसी अदालत या दूसरी संस्था में लंबित हो — शुरू में ही एक रास्ता चुनने की यह एक और वजह है।
ज़िला उपभोक्ता आयोग ₹50 लाख तक की शिकायतें सुनता है, जिसमें किसी भी घर का दावा आ जाता है। आप वहाँ शिकायत कर सकते हैं जहाँ आप रहते हैं, डिस्कॉम के दफ़्तर वाली जगह पर नहीं, और सरकार के ई-जागृति (e-Jagriti) पोर्टल से ऑनलाइन भी; सबसे निचले स्लैब, ₹5 लाख तक, में कोई फ़ीस नहीं है। उम्मीद रखिए कि डिस्कॉम दोष आपकी वायरिंग पर डालेगी, और कि मामले में हफ़्ते नहीं, महीने लगेंगे। पहली बात का जवाब पिछले हिस्से के सबूत हैं।
अगर अभी तक शिकायत ही नहीं की है, तो यहाँ से शुरू कीजिए: बिजली की ऐसी शिकायत कैसे करें जिसका जवाब मिले। नंबर, समय और लिखित रिकॉर्ड के वही नियम यहाँ भी लागू होते हैं।
उपकरण को असल में क्या बचाता है
ज़्यादातर घरों में जो दो उपकरण पहले से लगे हैं, वे इनमें से किसी से नहीं बचाते। MCB ओवरकरंट पर ट्रिप होता है: बहुत ज़्यादा धारा, जैसे शॉर्ट सर्किट या ओवरलोड में। RCCB तब ट्रिप होता है जब धारा अर्थ में रिसती है — यही ख़राब उपकरण छूने वाले इंसान को बचाता है। दोनों में से किसी को पता नहीं चलता कि वोल्टेज 350 पर पहुँच गया है।
जिसे पता चलता है, वह है ओवर-वोल्टेज सुरक्षा। कई स्टेबलाइज़र इनपुट अपनी सीमा से बाहर जाते ही आउटपुट काट देते हैं; मान मत लीजिए, जाँचिए कि आपके स्टेबलाइज़र में हाई-वोल्टेज कट-ऑफ़ है। फ़्रिज और टीवी के लिए बिकने वाले प्लग-इन वोल्टेज प्रोटेक्टर वोल्टेज तय दायरे से बाहर जाते ही बिजली काटते हैं और कुछ देर रुककर फिर जोड़ते हैं — और यही देरी कंप्रेसर को गरम हालत में दोबारा चालू होने से भी बचाती है। इलेक्ट्रीशियन डिस्ट्रीब्यूशन बोर्ड पर पूरे घर के लिए ओवर/अंडर-वोल्टेज रिले भी लगा सकता है।
सर्ज प्रोटेक्टर — मेज़ पर रखे स्पाइक गार्ड से लेकर बोर्ड पर लगे सर्ज प्रोटेक्टिव डिवाइस तक — माइक्रोसेकंड भर के झटकों के लिए बने हैं: स्विचिंग के झटके, पास गिरी आसमानी बिजली। इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए ये रखने लायक़ हैं। पर टूटा न्यूट्रल झटका नहीं है। यह लगातार बना रहने वाला ऊँचा वोल्टेज है, और ऐसे में स्पाइक गार्ड अपने साथ लगे सामान समेत ख़ुद भी जल सकता है।
फिर आदतें, जिनमें कुछ ख़र्च नहीं। बिजली जाए तो एसी, फ़्रिज, गीज़र और पंप दीवार के स्विच से बंद कर दीजिए। लौटे तो कुछ मिनट रुकिए और बत्तियों व स्टेबलाइज़र के डिस्प्ले पर नज़र रखिए; कुछ भी गड़बड़ लगे तो सब बंद रहने दीजिए और डिस्कॉम को फ़ोन कीजिए। भारी उपकरण एक-एक करके चालू कीजिए। और साल में एक बार वायरमैन से मीटर बोर्ड पर न्यूट्रल कसवाइए। इस पन्ने पर यही एक वजह है जिसे ठीक करना आपके हाथ में है।
अगर आपकी समस्या अचानक झटके की नहीं, लगातार कम वोल्टेज की है, तो उसका कारण और इलाज दोनों अलग हैं; वह हमने यहाँ समझाया है: कम वोल्टेज “हल्की बिजली” नहीं, एक ख़राबी है।
जो सवाल लोग सच में पूछते हैं
झटके से उपकरण जल जाए तो क्या डिस्कॉम अपने-आप ज़िम्मेदार है?
नहीं। स्टैंडर्ड्स ऑफ़ परफ़ॉर्मेंस का तय मुआवज़ा देर से मरम्मत के लिए है, उपकरण के लिए नहीं। उपकरण की क़ीमत वसूलनी है तो आम तौर पर उपभोक्ता आयोग के सामने दिखाना होगा कि सप्लाई असामान्य थी, कि वजह डिस्कॉम की तरफ़ थी, और कि उसी से नुक़सान हुआ।
दावा करने के लिए कितना समय है?
उपभोक्ता शिकायत घटना के दो साल के भीतर दायर करनी होती है; राष्ट्रीय आयोग ने घटना की तारीख़ को ही वाद-कारण की तारीख़ माना है। डिस्कॉम को कुछ ही दिनों में लिखिए, जब तक उसके रिकॉर्ड और पड़ोसियों की याद ताज़ा है।
पड़ोसियों के उपकरण ठीक रहे। क्या इससे मेरा दावा डूब गया?
ज़रूरी नहीं। टूटे न्यूट्रल में कम लोड वाले फ़ेज़ के घरों को ऊँचा वोल्टेज मिलता है और बाक़ियों को कम, इसलिए दूसरे फ़ेज़ के पड़ोसी बच गए हों, यह मुमकिन है। पर इसका मतलब यह ज़रूर है कि डिस्कॉम कहेगी ख़राबी आपकी वायरिंग में थी — इसलिए गली में ऐसे लोग ढूँढिए जिनका भी कुछ जला, और उनके बयान लीजिए।
क्या Power Watch की रिपोर्टें सबूत मानी जाती हैं?
पुष्टि के तौर पर, सबूत के तौर पर नहीं। वे दिखाती हैं कि आपके इलाक़े में दूसरे लोगों ने भी लगभग उसी समय वोल्टेज की गड़बड़ी दर्ज की, जो “सिर्फ़ आपका घर था” वाली दलील के ख़िलाफ़ काम आता है। फ़ैसला आपके काग़ज़ों पर होता है: शिकायत नंबर, पाठ्यांक, बिल, मैकेनिक की रिपोर्ट और पड़ोसियों के दस्तख़त किए बयान।
क्या अभी हो रहा है?
वोल्टेज की गड़बड़ी चलते-चलते ही दर्ज कीजिए। रिपोर्ट समय और जगह सहेज लेती है, और आपके पड़ोसियों — और डिस्कॉम — को दिखाती है कि बात एक घर की नहीं है।
झटके ज़्यादातर तय मरम्मत के बाद बिजली लौटने के आसपास आते हैं, और काम कब होना है यह पता हो तो पहले से सब बंद किया जा सकता है: अपने इलाक़े का बिजली शटडाउन शेड्यूल कैसे पता करें।
अगर झगड़ा जले उपकरण का नहीं, बिल का है, तो यहाँ से शुरू कीजिए: बिजली का बिल, एक-एक लाइन समझिए।
साझा कीजिए
यह जानकारी कहाँ से आई
यू.पी. पावर कॉरपोरेशन लि. बनाम अनीस अहमद, भारत का सर्वोच्च न्यायालय, 1 जुलाई 2013।
नॉर्थ दिल्ली पावर लि. बनाम विपिन तलवार, दिल्ली राज्य आयोग, FA-433/2006, 3 फ़रवरी 2009।
एच.पी.एस.ई.बी.एल. बनाम मोहिंदर गुप्ता, हिमाचल प्रदेश राज्य आयोग, प्रथम अपील 200/2023, 5 जनवरी 2026।
ई-जागृति, उपभोक्ता आयोगों में शिकायत दायर करने का उपभोक्ता मामले विभाग का पोर्टल।
मंच के नियम और फ़ीस बदलते रहते हैं, और हर राज्य अपने नियम ख़ुद लिखता है। अगर यहाँ लिखी कोई बात आपके राज्य के नियमों से मेल नहीं खाती, तो हमें बताइए — हमें लिखिए.